मिरकाहा चौक का इतिहास

                                     सादेक जमील तैमी

मिरकाहा चौक मनसाही प्रखंड का एक प्रसिध्द स्थान है यह चौक पहले "जाम तला "के नाम से मशहूर था । पुराने लोग अभी भी इसे जाम तला ही कहते हैं। इस का कारण यह है कि यहां जामुन के बहुत पेड़ लगे हुए थे। यह जमीन करीम चंद पटवरी की थी। पटवारी अंग्रेजो के खास आदमीयो मे से एक थे । मेरे बड़े बाप (अय्यूब अली )से इन की बड़ी गहरी दोस्ती थी।इन के पास बार बार आते थे पटवारी ही का बेटा ईनंदर बाबु थे जो बड़े क्रांति कारों मे से एक थे । "जाम तला "जंगलो, झाड़ीयों की आमजगाह थी । बाद में पटवारी ने पूरी जमीन "राधा,किरषणा के नाम कर दिया अौर अब यह जमीन "लाल कार्ड "के तौर पर है।
जहां तक बात "मिरकाहा चौक "की है। तो इस की कहानी यह है कि एक दिन मिरकाहा का एक सिकन्दर ईसराइल नामी लड़का फोन में बातचीत कर रहा था। बात करते हुए इस ने कह दिया कि में "करछुल चौक "में हुं! चूंकि शोयब (मवेशी ताजीर )जो एक बड़े ताजीर है। और बहुत अच्छे इंसान भी है। की माँ को लौग ऊरफ में "करछुल "कहते थे । हालांकि यह अच्छी बात नहीं है। और चौक का नाम एक गलत तरीके से कहा जा रहा था तब उसी समय समाज के बड़े और करता धरता लौग सर जोड़ कर बैठे । और निर्णय लिया कि आज के बाद से कौई भी इसे "करछुल "के नाम से नहीं पुकारेगा! बल्कि इसे "मिरकाहा चौक "के नाम से बुलाया जाएगा । यह वर्ष 2017 की बात है।
मैं चूंकि इसी मिरकाहा गाँव का वासी हूं। इस वजह से इस का इतिहास आप के सामने बयान करना अनिवार्य था । वरना इस के पशचात मेरा कोई उद्देश्य नहीं । किसी की प्रतिष्ठा को घटाना मेरा मकसद नहीं । इस का फायदा यह होगा कि आने वाली पीढ़ी इस का इतिहास लिखना चाहेगी तो बा आसानी लिख सकती ।
(थैंक्यू ….दादा अ0 सत्तार और अ0 रशीद का जिन के माध्यम से मै आपको यह इतिहास बयान कर सका )

جواب دیں

آپ کا ای میل ایڈریس شائع نہیں کیا جائے گا۔ ضروری خانوں کو * سے نشان زد کیا گیا ہے